ये बचपना नहीं तो और क्या है
छोटी बातों पर चिड़चिड़ाना
यों रूठ के तुम्हारा बेठ जाना
न मुझसे बात करना, न मान जाना
पर न छोड़ना इस बचपने को
किस्मत वालों को मिले है दोबारा
यों रूठना, मनाना, मान के फिर रूठ जाना,
बचपन के खेल, खूब खिलाना
न छोड़ना, न छूटने देना,
न किसी से, न किसी को,
यों ही डूबे रहना इस दुनिया मैं
ये बचपने की सुन्दर दुनिया
न सीमायें यहाँ, न ही मुश्किलें
हर वक़्त है बेवजह, बेफिक्र
मनमौला ये बचपन खेले है खूब
ख्वाबों की दुनिया मैं रहता है डूब
न छोड़ ऐसे बचपन को
रूठ जा, लेकिन,
फिर मान भी जा,
दोबारा रूठ जाने को
इस बचपने को,
सजा के रख,
तुझमें,
और मुझे दिखा कुछ झलकें
कुछ रूठीं हुईँ,
कुछ मनाई हुईँ।।