पहलगाम की सुबह थी ख़ामोश,
फिज़ाओं में फैला था मातम,
नन्हीं खिलती आँखों में, अब सिर्फ़ राख थी,
और ज़मीर से पूछता था हर घर, ये कैसी दरिंदगी थी?
वो तो बस घूमने निकले थे, पहाड़ों की ओर,
ना बंदूक थी, ना झंडा, बस सपने थे और कुछ शोर।
पर ज़ुल्म की गोली ने सपनों को भी कुचल डाला,
कायरता की सारी हदों को दरिंदगी ने पार डाला।
फिर उठी एक आँधी, शांति नहीं, निर्णय की,
आँसू अब तलवार बन चुके थे, और चुप्पी रणभेरी।
ऑपरेशन सिंदूर, ये एक युद्ध नहीं, इन्साफ़ था,
हर मासूम चीख़ का जवाब, और हर ग़म का हिसाब था।
हमने नहीं माँगी थी लड़ाई, पर अगर थोपी जाएगी,
तो हर गोली के ज़वाब में मिसायिले बरसाई जाएगी
ये चेतावनी है, सिर्फ़ सीमा पार नहीं, पूरे जग को,
भारत अब ना किसी की चुप्पी का कैदी है, ना सहनशीलता का ग़ुलाम।
दुश्मनों ने कोशिश की, मज़हब का ज़हर घोलने की,
पर मिट्टी ने क़सम खाई, ना टूटेंगे, ना डोलेंगे।
एक थे, एक हैं, और एक ही रहेंगे,
सब एक साथ चले हैं और चलते रहेंगे।
दिल्ली से दक्कन तक एक स्वर था,
हर विचार, हर दल, अब केवल राष्ट्र का स्वर था।
दूत बनकर निकले नेता, एक साथ कदम उठाए,
दुनिया से कह दिया, रुकेंगे ना हम बिना आतंक मिटाए।
कोई राजनीति नहीं, ये राष्ट्रधर्म था,
पटेल की दृढ़ता, गांधी का मर्म था।
जवाब वो नहीं था जो सिर्फ़ बारूद दे,
ये जवाब था, जो आत्मा को जागृत कर दे।
ना डरेंगे, ना झुकेंगे, ना पीछे हटेंगे,
जहाँ अन्याय होगा, वहीं हम उठेंगे।
सत्य की मशाल, अब हाथों में है,
दुश्मन को उसकी ही ज़ुबान,बातों में है।