Wednesday, June 18, 2025

पहलगाम की सुबह

 पहलगाम की सुबह थी ख़ामोश,

फिज़ाओं में फैला था मातम,

नन्हीं खिलती आँखों में, अब सिर्फ़ राख थी,

और ज़मीर से पूछता था हर घर, ये कैसी दरिंदगी थी?


वो तो बस घूमने निकले थे, पहाड़ों की ओर,

ना बंदूक थी, ना झंडा, बस सपने थे और कुछ शोर।

पर ज़ुल्म की गोली ने सपनों को भी कुचल डाला,

कायरता की सारी हदों को दरिंदगी ने पार डाला।


फिर उठी एक आँधी, शांति नहीं, निर्णय की,

आँसू अब तलवार बन चुके थे, और चुप्पी रणभेरी।

ऑपरेशन सिंदूर, ये एक युद्ध नहीं, इन्साफ़ था,

हर मासूम चीख़ का जवाब, और हर ग़म का हिसाब था।


हमने नहीं माँगी थी लड़ाई, पर अगर थोपी जाएगी,

तो हर गोली के ज़वाब में मिसायिले बरसाई जाएगी

ये चेतावनी है, सिर्फ़ सीमा पार नहीं, पूरे जग को,

भारत अब ना किसी की चुप्पी का कैदी है, ना सहनशीलता का ग़ुलाम।


दुश्मनों ने कोशिश की, मज़हब का ज़हर घोलने की,

पर मिट्टी ने क़सम खाई, ना टूटेंगे, ना डोलेंगे।

एक थे, एक हैं, और एक ही रहेंगे,

सब एक साथ चले हैं और चलते रहेंगे।


दिल्ली से दक्कन तक एक स्वर था,

हर विचार, हर दल, अब केवल राष्ट्र का स्वर था।

दूत बनकर निकले नेता, एक साथ कदम उठाए,

दुनिया से कह दिया, रुकेंगे ना हम बिना आतंक मिटाए।


कोई राजनीति नहीं, ये राष्ट्रधर्म था,

पटेल की दृढ़ता, गांधी का मर्म था।

जवाब वो नहीं था जो सिर्फ़ बारूद दे,

ये जवाब था, जो आत्मा को जागृत कर दे।


ना डरेंगे, ना झुकेंगे, ना पीछे हटेंगे,

जहाँ अन्याय होगा, वहीं हम उठेंगे।

सत्य की मशाल, अब हाथों में है,

दुश्मन को उसकी ही ज़ुबान,बातों में है।

तेरी रौशनी

 तेरी रौशनी के साथ एक सवाल उगता मेरे मन में,

ये जीवन तुझ से है, ऊर्जा है मेरे तन में।


किरणों में लिपटी ये दुनिया चमकती है जो,

असली है या सपना है — बनाया हुआ तेरो?


हर पत्ता, हर कली — तुझसे ही मुस्कराती है,

हर साँस में तेरी ही कोई बात समाती है।

तू दूर है — पर फिर भी सबसे पास,

जैसे आत्मा से जुड़ा कोई उजास।


तू सिखाता है — जलना भी ज़रूरी है,

पर उस जलन में प्रेम और धूरी है।

तेरे बिना सब ठहर सा जाता है,

जीवन ठिठकता है, समय सो जाता है।


तू हर सुबह उम्मीद की चादर लाता है,

अंधेरों को धीरे से हटाता है।

तू डूबता भी है — पर लौटकर आता है,

हर हार में एक नई शुरुआत दिखाता है।


ओ सूरज! तू सिर्फ़ प्रकाश नहीं, एक ज्ञान है,

हर जीव की आँखों में बसा एक गूढ़ प्रस्थान है।

तेरे बिना न दिशा है, न जीवन का गीत,

तू है तो सृष्टि है — तू नहीं तो सब रीत।

Saturday, June 7, 2025

मैं रद्दीवाला हूँ

 मैं रद्दीवाला हूँ, रद्दीवाला हूँ मैं,

टूटी हुई उम्मीदों को समेटता हूँ 

हर बिखरे सपने की किरच मुझे पुकारती है,

मैं उन्हें चुपचाप झोली में भर लेता हूँ।


उदास ख्यालों की गठरी बाँधता हूँ,

ताकि किसी चेहरे पर मुस्कान खिले,

हर आँसू जो चुपचाप गिरा,

मैं उसे लेकर, एक कहानी बुन लेता हूँ।

मैं रद्दीवाला हूँ|


तन्हाई के खाली डिब्बे इकट्ठा करता हूँ,

कि कोई दोस्ती की चाय उसमें उबाल सके,

कुछ पुराने, भूले-बिसरे लम्हे, मैं ले जाता हूँ, ताकि किसी का आज महक सके।

मैं रद्दीवाला हूँ|


निराशा के पन्नों को समेटकर

एक नई उम्मीद की किताब छापता हूँ,

दुखों की खरीद-फरोख्त करता हूँ,

ताकि तुम सुकून में जी सको।

मैं रद्दीवाला हूँ|


उदासी की तहों से लिपटी ख़ामोशियाँ,

जब कोई सुन नहीं पाता,

मैं उन्हें अपनी गाड़ी में भर लेता हूँ 

और उनसे कहानियाँ बनाता हूँ

जो शायद किसी और के ज़ख्म सी देती हैं|

मैं रद्दीवाला हूँ|


मैं तन्हाई को खरीदता हूँ सस्ते में,

कि किसी के जीवन में साथ महंगा न हो जाए।

हर बार जब कोई कहता है 

“अब कुछ नहीं बचा…”

मैं वहीं से शुरुआत करता हूँ।

मैं रद्दीवाला हूँ|


निराशा के धुएँ में से

मैं उम्मीद की चिंगारी तलाशता हूँ।

मैं जानता हूँ, हर निराश ख्याल को सिर्फ़ जगह चाहिए

जहाँ वो पिघल सके,और उसमें से निकल सके

कुछ रोशनी, कुछ राहत।

मैं रद्दीवाला हूँ|


मैं वो हूँ, जो टूटे खिलौनों में बचपन तलाशता है,

पुरानी चिट्ठियों में अधूरे इश्क़ की आहट सुनता है,

और घिसे जूतों में लम्बे सफ़रों की थकान पढ़ता है।

मैं रद्दीवाला हूँ||

इस बार की बारिश कुछ अलग है

 इस बार की बारिश कुछ अलग है

थोड़ी भीनी-भीनी सी है, थोड़ी गीली-गीली सी है

पर वो सोंधी सी खुशबू कहाँ है

वो मिट्टी की पहचान कहाँ है

इस बार की बारिश कुछ अलग है


कोयलों के कूह-कूह में वो शरारत नहीं

बचपन की कागज़ी नावों की हरारत नहीं

छत की टप-टप अब भीगाती नहीं

मन के सूने कोनों को हलचलाती नहीं

इस बार की बारिश कुछ अलग है


सड़कों पे पानी है, पर नदियों में नहीं

कोहरा है घटाओं में, पर सावन कहीं नहीं

तालाब की आँखें प्यास से भरी हैं

लेकिन शहर की गलियाँ लबालब घिरी हैं

इस बार की बारिश कुछ अलग है


बिजली की चमक है, पर रौशनी नहीं

बादलों की गड़गड़ाहट है, पर कोई कहानी नहीं

जिसे दादी सुनाती थीं झीलों के किनारे

अब यादें बन के रह गई हैं हमारे तुम्हारे

इस बार की बारिश कुछ अलग है


बारिश अब मौसम नहीं, मुद्दा बन गई है

कभी बाढ़, कभी सूखा बन चर्चाओं में सिमट गई है

बूँदें अब दिल को नहीं छूतीं जैसे पहले छूती थीं

अब बस शीशों पे गिरती हैं, पर छलकती नहीं

इस बार की बारिश कुछ अलग है

Tuesday, June 28, 2016

थमा हुआ क्षण

उनके पहलु से आज जाने का दिल न करे
रात रुक जाए और सुबह का घूंघट न उठे
उनको देखते रहें और वक़्त यों ही थम जाए
और वो थम हुआ क्षण ही बन जाये हयात ||