Saturday, June 7, 2025

इस बार की बारिश कुछ अलग है

 इस बार की बारिश कुछ अलग है

थोड़ी भीनी-भीनी सी है, थोड़ी गीली-गीली सी है

पर वो सोंधी सी खुशबू कहाँ है

वो मिट्टी की पहचान कहाँ है

इस बार की बारिश कुछ अलग है


कोयलों के कूह-कूह में वो शरारत नहीं

बचपन की कागज़ी नावों की हरारत नहीं

छत की टप-टप अब भीगाती नहीं

मन के सूने कोनों को हलचलाती नहीं

इस बार की बारिश कुछ अलग है


सड़कों पे पानी है, पर नदियों में नहीं

कोहरा है घटाओं में, पर सावन कहीं नहीं

तालाब की आँखें प्यास से भरी हैं

लेकिन शहर की गलियाँ लबालब घिरी हैं

इस बार की बारिश कुछ अलग है


बिजली की चमक है, पर रौशनी नहीं

बादलों की गड़गड़ाहट है, पर कोई कहानी नहीं

जिसे दादी सुनाती थीं झीलों के किनारे

अब यादें बन के रह गई हैं हमारे तुम्हारे

इस बार की बारिश कुछ अलग है


बारिश अब मौसम नहीं, मुद्दा बन गई है

कभी बाढ़, कभी सूखा बन चर्चाओं में सिमट गई है

बूँदें अब दिल को नहीं छूतीं जैसे पहले छूती थीं

अब बस शीशों पे गिरती हैं, पर छलकती नहीं

इस बार की बारिश कुछ अलग है

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