Saturday, May 21, 2016

निराशा और आशा

ये पंक्तियाँ है एक वयक्ति जो निराश है और उसका मित्र उसको आशा की राह दिखाने की कोशिश मैं |

निराश मित्र:

तेरे ज़िक्र में मेरा ख़्याल नहीं 
मेरे ख़्याल में तेरा ज़िक्र नहीं 
किस मोड़ पे आ गए हाथों में हाथ लिए 
एक दूसरे की फ़िक्र नहीं! 
वक़्त नहीं,जस्बात नहीं 
तू तू नहीं, मैं मैं नहीं; 
ये वो दुनिया नहीं, ये पहले जैसी ज़िन्दगी नहीं!!

आशावादी मित्र: 

ना मायूस हो न गिलाह करो 
ज़िन्दगी से तुम सुलह करो 
यह दुनिया मन का आईना हे 
हर पल रंग बदलती हे 
आज दुख के छाए बादल हें 
कल सुख की वर्षा बरसेगी 
दिल के दरवाज़े को दस्तक जो दोगी 
पा जाओगी राह नई 
और जो दस्तक ना भी दी अगर 
खुल जाऐंगे द्वार कई 
एक बार जो मुढ़ के देखो 
खुल जाऐंगे द्वार कई||

No comments:

Post a Comment