Sunday, May 22, 2016

कुछ बोल

एक अधूरी कविता ... 

कुछ बोल, ऐसे जो कागज़ के पन्नों पर,
कुछ बोल, ऐसे जो दिल को दस्तक दें
कुछ बोल, जिनको पंख हैं लग गए,
कुछ बोल, ऐसे जो धुन में खो गए

कुछ बोल, वो, जो झकझोर दें
कुछ बोल, ऐसे, जो सोने न दें
कुछ बोल, काली घटा हों जैसे
कुछ बोल, ऐसे, जली ज़ुबाँ हों वैसे

कुछ बोल, नज़रों से हैं झांकते
कुछ बोल, मुझसे दिल हैं मांगते
कुछ बोल, जो मन मैं हैं बस गए
कुछ बोल, जो खिखिला के हस गए

कुछ बोल, ऐसे जो बोल न पाएं
कुछ बोल, वो भी जो सुने न जाएँ
कुछ बोल, बोल के थक जाएँ
कुछ बोल, सुनके सुकून न आये

कुछ बोल, जिनकी शक्ल भी हो
कुछ बोल, वो जो बेशक्ल हों
कुछ बोल, वो जो आईने कहें
कुछ बोल, जो खामोश रहें

कुछ बोल, जो की ज़िन्दगी हो
कुछ बोल, जिनसे, ज़िन्दगी हो
कुछ बोल, जो हमसफ़र बन गए
कुछ बोल, जो बेफिकर कर गए

कुछ बोल, चुभते तीर की तरह
कुछ बोल, जो दिशाहीन हैं
कुछ बोल, जैसे धूप में छाओं
कुछ बोल, जैसे, जलती धरती पर नंगे पाओं

कुछ बोल, ऐसे, जैसे वक़्त के साये
कुछ बोल, जो रेत पर लिख जाये
कुछ बोल, लिख कर भी लिखें न जाएं
कुछ बोल, पढ़ कर भी सुने न जाएं

....

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